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Maharana Pratap |विश्व के सर्वश्रेष्ठ योद्धा को नमन

maharana pratap jayanti 2023 maharana pratap punyatithi विश्व के सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं में से प्रमुख योद्धा एक यशस्वी संघर्षशील कुशल प्रशासक महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि पर आप सभी को शुभकामनाएं। प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 में हुआ था। जब उसके पिता की मृत्यु हुई उसकी अवस्था 32 वर्ष की थी। उसने अपने पिता के साथ जंगलों, घाटियों और पहाड़ों में रहकर कठोर जीवन बिताया था। उसने उसके साथ रहकर गिरवा में नयी बस्तियों को बसाने तथा अन्य निर्माण कार्य में योग दिया था। वह इस पहाड़ी भाग में ‘कीका’ नाम से सम्बोधित किया जाता था जो स्थानीय भाषा में ‘छोटे बच्चे’ का सूचक है ।

आज भी दक्षिण-पश्चिमी मेवाड़ के पुत्र को ‘कीका’ या ‘कूका’ कहते हैं। इस विशेष प्रकार के नाम से प्रताप की लोकप्रियता का अनुमान लगाया जा सकता है। अभाग्यवश इन सभी आवश्यक गुणों के होते हुए भी उसके पिता ने भट्टियाणी रानी पर विशेष अनुराग होने से उनके पुत्र जगमाल को अपना युवराज बनाया था, जबकि अधिकार प्रताप का था।

शक्तिसिंह अपने पिता के समय से मुगलों की सेवा में जा रहा था और सम्भवतः चित्तौड़ के आक्रमण के समय काम आ गया। न्याय दृष्टि से प्रताप की ही बारी राजगद्दी पर बैठने की थी, परन्तु राणी
के आग्रह से तथा कुछ सरदारों के सहयोग से, जब सभी लोग महाराणा के दाह संस्कार में लगे हुए थे, जगमाल का राज्यतिलक कर दिया गया। श्मशान भूमि में जगमाल को उपस्थित न • पाकर ग्वालियर के राजा रामसिंह और जालौर के अखैराज सोनगरे ने वहीं उत्तराधिकारी सम्बन्धी प्रश्न उठाया और ज्योंही वे गोगुन्दे लोटे, प्रताप को महाराणा घोषित कर दिया।

इस पर जगमाल अप्रसन्न होकर अकबर के पास पहुँचा, जिसने उसे पहले जहाजपुर और पीछे आधी की जागीर दे दी। सिरोही में ही 1583 ई. में दताणी के युद्ध में उसकी मृत्यु हो गयी

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प्रताप और उसके लिए समस्याएँ मेवाड़ राज्य की गद्दी तो प्रताप को मिल गयी, परन्तु उस समय की संकटकालीन स्थिति में राज्य का भार सँभालना कोई सरल विषय नहीं था। मुगल आक्रमण के फलस्वरूप राज्य की व्यवस्था सन्तोषजनक नहीं थी। सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी मेवाड़ में स्थिरता नहीं आने पायी थी। चित्तौड़, बदनौर, शाहपुरा, रायला आदि मेवाड़ के सीमान्त भाग मुगलों के हाथ में चले गये थे, जिससे राज्य की आय और प्रतिष्ठा घट चुकी थी।

इन भागों में मुगली प्रभाव बढ़ रहा था। इन समस्याओं को हल करने के लिए प्रताप के लिए दो ही मार्ग खुले हुए थे। या तो वह अकबर के सम्मुख अपना आत्म-समर्पण कर दे और मुगल व्यवस्था का अंग बन जाए।

ऐसी स्थिति में वह खोए हुए भाग पुनः प्राप्त कर सकता था और शीघ्र ही राज्य में सुव्यवस्था स्थापित हो सकती थी। यदि वह एक मुगल जागीरदार के रूप में रहना चाहता था तो सभी सुविधाएँ उसके लिए उपलब्ध थीं। दूसरा यह था कि वह अपना स्वतन्त्र अस्तित्व और अपने देश के गौरव की प्रतिष्ठा बनाए रखे।

यह मार्ग सरल नहीं था। दूसरे विकल्प को अपनाने के लिए उसे लम्बे तथा घातक युद्ध में उतरना पड़ेगा। फिर भी अपने संस्कारों और विचारों से उसने दूसरे विकल्प, अर्थात् मुगलों से संघर्ष, को ही चुना ।

इस संघर्ष की तैयारी में उसने सबसे पहले मेवाड़ को संगठित करने का बीड़ा उठाया। अपने कर्त्तव्य और विचारों से उसने सामन्तों और भीलों का एक गुट बनाया जो हर समय देश की रक्षा के लिए उद्यत रहे। उसे अपने पिता के समय में भीलों से मिलने-जुलने तथा साथ रहने का अवसर मिला था। इसी समय से उसने उनसे निकटतम सम्बन्ध स्थापित कर रखा था।

उसने प्रथम बार इन्हें अपनी सैन्य-व्यवस्था में उच्च पद देकर उनके सम्मान को बढ़ाया। मुगलों से अधिक दूर रहकर युद्ध का प्रबन्ध करने के लिए उसने गोगुन्दे से अपना निवास-स्थान कुम्भलगढ़ को बदल लिया। जन-सम्पर्क के द्वारा भी उसने देश में एक व्यापक जागरण को जन्म दिया। इन प्रारम्भिक कार्यों से उसने मेवाड़ में एकसूत्रता ला दी जिससे लम्बे युद्ध सम्पूर्ण राज्य से उसे सहयोग मिल सके। में

वैसे तो अकबर अपनी विस्तार नीति में इस प्रकार के संगठन को नहीं पनपने देना चाहता था, परन्तु ज्यों-ज्यों उसे अनुभव होने लगा उसका दृष्टिकोण बदला। वह राजपूतों के संगठन का प्रयोग सम्पूर्ण भारत के राज्य की दृढ़ता के लिए करना चाहता था। वह यह समझ चुका था कि यदि उसके नेतृत्व में संगठित मुगल राज्य की स्थापना करना है तो राजपूतों का सहयोग वांछनीय होगा। maharana pratap image

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फिर भी जिस राज्य की कल्पना अकबर कर रहा था उसमें प्रताप अपना स्थान सम्मानित नहीं मानता था। यह अपने वंश गौरव और व्यक्तिगत विशुद्ध स्थिति को अधिक महत्त्व देता था।

वह अपने राज्य को एक इकाई के रूप में रखकर अपने राज्य तत्त्व की प्रतिष्ठा
उच्च बनाये रखने में श्रेय समझता था, बजाय इसके कि वह एक मुगल राज्य का आश्रित सामन्त हो तो अपने अधिकारों की मान्यता दिल्ली से प्राप्त करे अकबर से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए बाध्य होने की सम्भावना से भी प्रताप में एक स्वाभाविक अरुचि थी। वह नहीं चाहता था कि मेवाड़ की परम्परा तोड़ने का कलंक उसके सिर मढ़ा जाय ।

अकबर को चित्तौड़ विजय के बाद राजस्थान के कई शासकों से मैत्री सम्बन्ध या वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने में सफलता मिल चुकी थी, परन्तु मेवाड़ का इस सम्बन्ध में सहयोग नहीं देना उसे चुभ रहा था। फिर भी वह यह नहीं चाहता था कि बलात् ऐसा किया जाए। जब मानसिंह गुजरात से लौट रहा था तो उसे आदेश दिया गया कि वह उदयपुर जाकर राणा प्रताप को समझाये कि वह अकबर की सर्वोपरि शक्ति को मान्यता दे और शाही दरबार में उपस्थित हो।

उसने विशेष रूप से उसे यह भी कहा था कि वैवाहिक सम्बन्ध के विषय पर बल न दिया जाय और राणा को आश्वासन दिया जाय कि आन्तरिक मामलों में वह स्वतन्त्र रहेगा। 1573 ई. में जब मानसिंह ने राणा को इस सम्बन्ध में टटोला तो उसने अकबर की अधीनता मानने में आनाकानी की।

मानसिंह अन्त में असफल होकर लौट गया। इसके बाद इसी आशय के दो और पैगाम महाराणा के पास भगवानदास तथा टोडरमल के नेतृत्व में भेजे गये, परन्तु पहले की भाँति वे भी विफल रहे, अलबत्ता व्यवहार और वार्तालाप में राणा शिष्टता की सीमा में रहा।

इस सम्बन्ध में कर्नल टॉड ने मानसिंह और राणा के सम्मेलन, वार्तालाप और व्यवहार के सम्बन्ध की घटना उदयसागर पर होना बताया है। बताया जाता है कि यहाँ एक भोज का आयोजन राणा की तरफ से आतिथ्य के रूप में किया गया था, जिसमें राणा ने स्वयं उपस्थित न होकर अपने कुँवर अमरसिंह को भेजा । जब यह पूछा गया कि राणा इसमें सम्मिलित क्यों नहीं हुए तो यह बता दिया गया कि वे कुछ अस्वस्थ हैं।

मानसिंह ताड़ गया कि राणा उससे परहेज करते हैं, क्योंकि कछवाहों ने अकबर से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर लिया है। कुँवर बिना भोजन किये वहाँ से चल दिया और ठीक इस घटना के बाद अपमान का बदला लेने के लिए मुगल सेना को लेकर मेवाड़ में आ धमका

इस कथा को लगभग सभी लेखकों ने मान्यता दी है, परन्तु हमारे अनुसन्धान से प्रमाणित होता है कि इस कथा का किसी समसामयिक स्रोत में जिक्र नहीं है, चाहे वह स्थानीय हो या मुगली। यदि मानसिंह का इस प्रकार अपमान होता तो बदायूँनी अवश्य उसका उल्लेख अपने ‘मुन्तखब’ में करता। मानसिंह के और प्रताप के मिलने का स्थान अबुल फजल ने गोगुन्दा दिया है, न कि उदयसागर, जो अधिक ठीक मालूम पड़ता है।

यह सारी कथा टॉड ने ख्यातों से ली है, जो पिछली होने से विश्वसनीय नहीं हो सकती। राज रत्नाकर तथा अमरकाव्य में मानसिंह तथा प्रताप की भेंट अच्छे ढंग से होने का उल्लेख हैं। यदि इस प्रकार के अशिष्ट आचरण की सम्भावना रहती तो इस घटना के कुछ वर्षों पीछे लिखी गयी जगन्नाथराय प्रशस्ति में इसका जिक्र होना चाहिए था, परन्तु हल्दीघाटी के युद्ध की घटना देने के साथ इस घटना
[आधार का इसमें कोई उल्लेख नहीं है। ऐसी स्थिति में इस कथा का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं दीखता । इसका कुछ संकेत नैणसी ने प्रथम बार दिया है, ऐसा प्रतीत होता है कि जिसको आधार मानकर पिछले चारणों और भाटों ने अपनी-अपनी मान्यता और पर इस कथा को कुछ हेर-फेर के साथ लिख डाला ।

हल्दीघाटी का युद्ध— कई लेखकों ने मानसिंह के अपमान की कथा के साथ अकबर का वैमनस्य सीधा जोड़ दिया है और उसी को हल्दीघाटी के युद्ध का कारण बताया है, परन्तु मानसिंह के गोगुन्दा जाने (1573) और हल्दीघाटी के युद्ध के होने (1576 ई.) में तीन वर्ष का अन्तर है, अतएव उसको युद्ध का कारण नहीं माना जाना चाहिए।

युद्ध का सीधा कारण यही था कि अकबर मेवाड़ की स्वतन्त्रता समाप्त करने पर तुला हुआ था और प्रताप उसकी रक्षा के लिए। दोनों की मनोवृत्ति और भावनाओं का मेल न होना इस युद्ध का प्रमुख कारण था। इसके साथ मुगलों के राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थ भी जुड़े हुए थे

जिन्होंने युद्ध की सम्भावना को निश्चित कर दिया। जब अकबर के द्वारा किये गये शान्त समझौते के प्रयत्न निष्फल हो गये तो उसे निश्चय हो गया कि मेवाड़ की समस्या का निर्णय बिना युद्ध के नहीं हो सकता।

प्रताप ने भी जब अकबर की एक बात न मानी तो वह भी ताड़ गया कि इसकी प्रतिक्रिया उसके राज्य के लिए भयंकर परिणाम ला सकती है। यह समझते हुए उसने पुँजा नामी नेता को अपने भील सहयोगियों के साथ बुलाकर मेवाड़ की सुरक्षा प्रबन्ध में लगाया । दूरस्थ सामन्तों को भी अपनी-अपनी सीमा में सतर्क रहने और आवश्यकता पड़ने पर युद्ध के लिए तैयार हो जाने के लिए सजग कर दिया।

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पर फिर भी घुड़सवारों के दल को नियुक्त कर दिया जो उस भाग से कुम्भलगढ़ के माल की रक्षा करते रहें। मेवाड़ के मैदानी भाग में रहने वालों के लिए पहाड़ी घाटियों में बसने की व्यवस्था कर दी और यह आदेश निकाल दिया कि मैदानी खेतों में किसी प्रकार का अन्नोत्पादन नहीं किया जाय, जिससे भीतर घुसने वाली शत्रुसेना को किसी प्रकार की रसद न मिल सके। यदि ऐसा कोई करेगा तो वह प्राणदण्ड का भागी होगा। यह प्रयोग उदयसिंह की नीति के अनुरूप था, जिसने चित्तौड़ के आस-पास के प्रान्तों से गिरवा में बस्ती को बसाया था

अकबर ने भी युद्ध को टालने की कोई सूरत न पाकर अजमेर के मानसिंह को धन और जन देकर मेवाड़ की ओर भेजा। 3 अप्रैल, 1576 ई. को वह अजमेर से रवाना होकर, माण्डलगढ़, मोही आदि मुकामों से गुजरता हुआ खमनोर के पास मोलेला गाँव के पास जा टिका । प्रताप ने भी लोशिंग में अपने डेरे डाले। दोनों सेनाएँ एक दूसरे के बलाबल का अनुमान लगा और में 21 जून, 1576 ई. प्रातः युद्ध भेरी बजी।

प्रारम्भ में जो कुछ मुगल सैनिकों के अग्रदल ने घाटी पर टिके हुए राजपूत सैनिकों पर वार किया, जिसके फलस्वरूप उनमें से कई मुगल सैनिक मारे गये। इस सफलता से उत्साही राजपूत घाटी के नाके से नीचे उतर आये और शत्रुदल पर टूट पड़े। यह पहला वार इतना जोशीला था, कि मुगल सैनिक चारों ओर जान बचाकर भाग गये।

बदायूँनी, जो मुगल दल में था और जिसने इस युद्ध का आँखों देखा
हाल लिखा है, स्वयं भाग खड़ा हुआ। अपने पहले मोर्चे में सफल होने से राजपूत बनास नदी के काँठे वाले मैदान में, जिसे रक्त ताल कहते हैं, आ जमे। मुगल भी फिर यहाँ इकट्ठे हो गये और युद्ध जारी हुआ।

यहाँ दोनों दलों के पार्श्ववर्ती, सैनिक, केन्द्रीय जत्थे तथा हाथियों के दल बारी-बारी से भिड़ गये। दोपहर का समय हो गया। युद्ध की गरमागरमी को, जैसे बदायूँनी लिखता है, सूर्य ने अपनी तीक्ष्ण किरणों से अधिक उत्तेजित कर दिया, जिससे खोपड़ी का खून उबलने लगा। सभी ओर से योद्धाओं की हलचल से भीड़ ऐसी मिल गयी कि शत्रु सेना के राजपूत और मुगल सेना के राजपूतों का पहचानना कठिन हो गया।

राणा कीका अपने साथी लूणकर्ण, रामशाह, ताराचन्द, पूँजा, हकीम सूर आदि के साथ शत्रु दल को चीरता हुआ मानसिंह के हाथी के पास पहुँच गया। उसने फौरन अपने चेतक घोड़े को एक ऐसी एड़ी मारी कि उसने अपने अगले पाँवों को हाथी के दाँतों पर टिका दिया। शीघ्र ही राणा ने मानसिंह का काम तमाम करने के लिए भाले का वार उस पर किया। पर यह वार निष्फल गया,

क्योंकि मानसिंह अपने हौदे में दुबक गया और वार को महावत ने झेल लिया। इस चलाचली में घोड़े की एक टाँग हाथी की सूँड़ के खन्जरे से कट गयी। अब तो राणा को मुगल सैनिकों ने चारों ओर से घेर लिया। उसी क्षण राजपूत वीरों ने उस भीड़-भाड़ से राणा को किसी तरह निकाल कर बचा लिया। टूटी टाँग के घोड़े से राणा अधिक दूर नहीं पहुँचा था कि मार्ग में ही घाटी के दूसरे नाके के पास चेतक की मृत्यु हो गयी। राणा ने उसके अन्तिम संस्कार द्वारा अपने प्यारे घोड़े को श्रद्धांजली अर्पित की

इस घटना के साथ बताया जाता है कि शक्तिसिंह भी जो मुगल दल के साथ उपस्थित था, किसी तरह बचकर जाते हुए राणा के पीछे चल दिया और अपने घोड़े को उसे देकर अपने…. कर्त्तव्य का पालन किया। वास्तव में यह कथा प्रमाणों के आधार पर प्रतिपादित नहीं की जा सकती । शक्तिसिंह पहले ही चित्तौड़ के आक्रमण के समय काम आ चुका था। सम्भवतः दोनों भाइयों को मिलाने की कथा भाटों ने गढ़ ली है। यदि शक्तिसिंह मुगलों के साथ होता तो बदायूँनी की सूची में उसका नाम अवश्य होता।

राणा तो वैसे इस तुमुलयुद्ध से अपने डेरे की ओर लौट गया, परन्तु युद्ध स्थल में लड़ाई ने बड़ा भयंकर रूप धारण किया। राजपूतों ने अपने जीवन की बाजी लगाना आरम्भ कर दिया, जिसमें एक के बाद दूसरा धराशायी होता गया। ऐसे वीरों में नेतनी, रामशाह अपने पुत्रों के साथ; राठौड़ शंकरदास, झाला, मानसिंह आदि मुख्य थे।

मुगल सेना भी उस दिन अपने डेरे को लौटी, परन्तु भीलों ने रात भर लूट-खसोट, घात-प्रत्याघात की विधि से उन्हें चैन न लेने दिया। नितान्त दूसरे दिन मानसिंह अपने सैनिकों के साथ गोगुन्दे की ओर रवाना हो गया, जहाँ चारों ओर खाइयाँ खुदवाकर और दीवारें बनवाकर वह किसी तरह रहने लगा।

महाराणा भी अपने डेरे पर पहुँचकर घायल सिपाहियों की देखभाल करता रहा और साथ-ही-साथ इस प्रयत्न में लगा रहा कि गोगुन्दे में टिकी हुई मुगल सेना को बाहर से कोईसहायता न पहुंचे। किसी तरह अपना समय गुजारती हुई गोगुन्दे में टिकी हुई मुगल सेना के आदमी एक-एक कर लौट गये। मानसिंह भी जब शाही दरबार में पहुंचा तो अकबर ने समय उसकी ‘ड्योढ़ी बन्द कर दी, क्योंकि वह राणा को मारने या बन्दी बनाने में हुआ था

असफल इस युद्ध में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी विजय को माना है। यदि हम इसका अधिक गहराई से देखें तो पाते हैं कि पार्थिव विजय तो मुगलों को मिली, परन्तु वह विजय पराजय से कोई कम नहीं थी।

राणा ने तो मुगलों को इस बार ऐसा छकाया कि वे अपना पिण्ड छुड़ाकर मेवाड़ से भाग निकले। यह राजपूत शैली का एक नया युद्ध था और लम्बे युद्ध का श्रीगणेश था। यदि ऐसी स्थिति में हम हल्दीघाटी के युद्ध को लम्बे युद्ध का आरम्भ कह दें या स्थगित युद्ध कह दें तो इस युद्ध के परिणाम ठीक समझ में आ सकते हैं। आगे की घटना बताती है।

कि भविष्य में भी अकबर ने राणा को मारने या बन्दी बनाने के प्रयत्नों को जारी रखा। एक के बाद दूसरे मुगल सेनापति आते रहे। 13 अक्टूबर, 1576 ई. को अकबर स्वयं भी गोगुन्दे आया, परन्तु राणा इधर-उधर छिपकर मुगलों के प्रयत्नों को विफल बनाता रहा। अन्त में अकबर को सीमान्त भागों के उपद्रव में व्यस्त होने के कारण मेवाड़ की ओर के अभियानों में शिथिलता लानी पड़ी। राणा ने भी इस समय को उपयुक्त समझ अपनी नयी व्यवस्था स्थापित की जिसका वर्णन आगे करेंगे

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हल्दीघाटी के युद्ध में राणा को खेत क्यों छोड़ना पड़ा-राणा को रण-स्थल से जाने के लिए जो विवश होना पड़ा उसके कई कारण थे। इस युद्ध के आरम्भ में 89 अग्रगामी दल को नष्ट करने के बाद राणा हल्दीघाटी के नाके को छोड़कर मैदान में चला आया; यह एक बड़ी भूल थी। नीचे उतर जाने पर भी परम्परागत युद्ध शैली को अपनाया गया था वह भी ठीक नहीं था।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि मैदानी लड़ाई में मुगल अधिक कुशल थे। ऐसी स्थि में राजपूतों के लिए ‘रक्तताल’ में लड़ी गयी लड़ाई राजपूतों के लिए अधिक उपयोगी न हो सकी । वहाँ मुगलों की सैनिक संख्या तथा उत्तम शस्त्रों ने राजपूतों को अधिक समय तक नहीं दिया।

अलबत्ता हम राणा की इस बात में प्रशंसा करेंगे कि जब युद्ध पूरे जोश से चल रहा था उसने धैर्य से काम लिया और युद्ध-स्थल छोड़ पहाड़ियों में चला गया। अपने पिता की नीति का अवलम्बन कर वह बचाव प्रणाली के प्रयोग से युद्ध की गति को चलाता रहा। जिसमें अकबर को लम्बे युद्ध में परेशानी का सामना करना पड़ा ।।

प्रताप सम्बन्धी भ्रान्तियों का निराकरण-हल्दीघाटी के युद्ध के बाद कई लेखकों और प्रताप के प्रशंसकों की यह धारणा रही है कि उसे जगह-जगह जंगलों में भटकना पड़ा और खाने-पीने की आवश्यकता की पूर्ति में कठिनता का अनुभव करना पड़ा।

इस स्थिति का स्वरूप एक कथानक के द्वारा इस प्रकार बताया जाता है कि जब उसकी लड़की के हाथ से बिल्ली रोटी का टुकड़ा छीनकर ले गयी और उसकी पुत्री रोने लगी तो राणा इस स्थिति को देखकर बड़े दुःखी हुए आदि ।

प्रथम तो राणा के कोई पुत्री ही नहीं थी इसलिए उसका रोना अप्रसांगिक है। दूसरा जिस पहाड़ी भाग में राणा घूमते फिरे थे वह भाग इतना उपजाऊ था कि उन्हें खाने-पीने में कठिनता का सामना करना पड़ा, यह समझ में नहीं आता। मेवाड़ की प्रजा इतनी उदार थी उसने हर प्रकार से राणा की सहायता की और वह उसके कष्ट के दिनों में उसके
कन्धे से कन्धा मिलाकर अपना सहयोग देती रही। पिछले स्रोतों में भी इस कथा का उल्लेख नहीं मिलता और न डा. ओझा ही इसमें विश्वास करते हैं। ये तो कर्नल टॉड के मस्तिष्क की उपज मात्र है

इसी प्रकार एक और जनश्रुति प्रसिद्ध है कि एक दिन सम्राट अकबर ने कुँवर पृथ्वीराज (बीकानेर) को जो मंगल दरबारी था, कहा कि प्रताप ने हमारी अधीनता स्वीकार कर हमें बादशाह कहना प्रारम्भ कर दिया है। पृथ्वीराज ने इस स्थिति को स्वीकार न कर राणा को नीचे लिखें

दोहे लिखकर भेजे।

पातल जो पातसाह, बोले मुख हूँतां वयण ।

मिहर पछम दिस माँह, ऊगे कासप राव उत ।।

पटकूँ मूँछा पाण, के कटकूँ निज तन करद ।

दीजै लिख दीवाण, इण दो महली बात इक ॥

इसका आशय यह था कि यदि प्रताप अपने मुख से अकबर को बादशाह कहे तो सूर्य पश्चिम में उग जाये। अर्थात् जैसे सूर्य का पश्चिम में उगना असम्भव है वैसे प्रताप के मुख से भी अकबर के लिए बादशाह निकलना सम्भव नहीं।

हे दीवाण (महाराणा), अब मुझे एक संकेत यह दीजिए कि मैं मूँछों पर ताव दूँ या अपनी तलवार का अपने शरीर पर वार करूँ।

महाराणा ने भी इसका उपयुक्त उत्तर इस प्रकार दिया-

तुरक कहासी मुख पतौ, इण तन सूँ इकलिंग ।

ऊगै जाँही ऊगसी, प्राची बीज पतंग ||

खुसी हूँत पीथल कमध, पटको, मूँछा पाण।

पछटण है जैतै पतौ, कलमाँ सिर केवाण ॥

इसका आशय यह था कि इस मुख से बादशाह को तुर्क ही कहा जाएगा और सूर्य जहाँ उगेगा वहीं उगता रहेगा। हे पृथ्वीराज ! तुम प्रसन्नता से मूँछों को ताव देते रहो, क्योंकि प्रताप की तलवार तुर्कों के सिर पड़ती ही रहेगी

यह कहना तो बड़ा कठिन है कि इस तरह का पत्र-व्यवहार वास्तव में दोनों व्यक्तियों में हुआ था या इसका सम्बन्ध किसी परम्परा से चलने वाली जनश्रुति से है, परन्तु इतना तो निश्चित है कि पृथ्वीराज अपने समय में अच्छी कविता बनाता था। साथ-ही-साथ यह भी सन्देहात्मक है कि महाराणा बादशाह से मेल-जोल बढ़ाने का कोई इरादा भी किया हो। यदि ऐसा उसका विचार होता तो इसका उल्लेख फारसी तवारीखों में अवश्य होता ।

इसी विपत्ति काल के सम्बन्ध में एक जनश्रुति और प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि जब महाराणा के पास सम्पत्ति का अभाव हो गया तो उसने देश छोड़कर रेगिस्तानी भाग में जाकर रहने का निर्णय किया, परन्तु उसी समय उसके मन्त्री भामाशाह ने अपनी निजी सम्पत्ति लाकर समर्पित कर दी जिससे 25 हजार सेना का 12 वर्ष तक निर्वाह हो सके।

इस घटना को लेकर भामाशाह को मेवाड़ का उद्धारक तथा दानवीर कहकर पुकारा जाता है। यह तो सही है कि भामाशाह के पूर्वज तथा स्वयं वे भी मेवाड़ की व्यवस्था का काम करते आये थे, परन्तु यह
मानना कि भामाशाह ने निजी सम्पत्ति देकर राणा को सहायता दी थी, ठीक नहीं। भामाशाह राजकीय खजाने को रखता था और युद्ध के दिनों में उसे छिपाकर रखने का रिवाज था । जहाँ द्रव्य रखा जाता था,उसका संकेत मन्त्री स्वयं अपनी बही में रखता था । सम्भव है कि राजकीय द्रव्य भी जो छिपाकर रखा हुआ था, लाकर समय पर भामाशाह ने दिया हो या चूलिया गाँव में मालवा से लूटा हुआ धन भामाशाह ने समर्पित किया हो। डा. ओझा भी इस कथा को कल्पित ही मानते हैं

कुछ भी हो, महाराणा ने अकबर के द्वारा आयोजित एक के बाद दूसरे आक्रमण का धैर्य से मुकाबला किया और ज्यों-ज्यों मुगलों का ध्यान मेवाड़ की ओर से अन्य प्रान्तों में लगता जाता था, महाराणा ने मेवाड़ की बहुत-सी खोयी हुई भूमि को पुनः प्राप्त कर लिया।

केवल चित्तौड़ और माण्डलगढ़ राणा के अधिकार में नहीं आ सके। लगभग 1585 ई. से 1597 ई. तक का लम्बा समय राणा को मिला जिसमें उसने दक्षिणी पर्वतीय भाग में चावण्ड नामक कस्बे में नयी राजधानी बनायी, जहाँ मुगलों की लम्बी सेना सरलता से नहीं पहुँचने पाये।

इस शान्ति काल में अथक परिश्रम से उसने राज्य में सुव्यवस्था भी स्थापित कर ली । अन्त में पाँव में किसी असावधानी से कमान से लग जाने से वह अस्वस्थ हो गया, जिससे 19 जनवरी, 1597 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी । प्रताप का चावण्ड के पास अनुमानतः डेढ़ मील की दूरी पर, बण्डोली गाँव के निकट बहने वाले नाले के तट पर अग्नि संस्कार हुआ, जहाँ उसके स्मारक के रूप में एक छोटी-सी छतरी बना दी गयी। कर्नल टॉड द्वारा पीछोले की पाल के महलों में राणा की मृत्यु का वर्णन निराधार है

जब प्रताप की मृत्यु के समाचार अकबर के कानों तक पहुँचे तो उसे भी बड़ा क्षोभ हुआ। इस स्थिति का वर्णन दूरसा आढा ने किया है, जो अकबर के दरबार में उपस्थित था। उसने इस परिस्थिति का चित्रण छप्पय में कहा, “अस लेगो अणदाग, पाग लेगो अणनामी गहलोत राण जीती गयी, दसण मूँद रसणा डसी । नीसास मूक भरिया नयण, तो मृत शाह प्रतापसी ।

” आशय यह था कि राणा प्रताप तेरी मृत्यु पर बादशाह ने दाँत में जीभ दबायी और निःश्वास से आँसू टपकाए, क्योंकि तूने अपने घोड़े को नहीं दगवाया और अपनी पगड़ी को किसी के सामने नहीं झुकाया। वास्तव में तू सब तरह से जीत गया

प्रताप का व्यक्तित्व – प्रताप के सम्बन्ध में कर्नल टॉड का कथन है कि “अकबर की उच्च महत्त्वाकांक्षा, शासन-निपुणता और असीम साधन ये सब बातें दृढ़-चित्त महाराणा प्रताप की अदम्य वीरता, कीर्ति को उज्ज्वल रखने वाला दृढ साहस और अध्यवसाय को दबाने में पर्याप्त न थीं।

आल्प्स पर्वत के समान अरावली में कोई भी ऐसी घाटी नहीं, जो प्रताप के किसी-न-किसी वीर कार्य, उज्ज्वल विजय या उसके अधिक कीर्तियुक्त पराजय से पवित्र न हुई हो। हल्दीघाटी मेवाड़ की थर्मोपिली और दिवेर मेवाड़ का मेरेथान हैं।
डा. ओझा 8 ने भी महाराणा के व्यक्तित्व के विषय में लिखा है कि “प्रातः स्मरणीय हिन्दूपति और शिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह का नाम राजपूताने के इतिहास में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण और गौरवास्पद है। वह स्वदेशाभिमानी, स्वतन्त्रता का पुजारी, रण-कुशल, स्वार्थत्यागी, नीतिज्ञ, दृढ़-प्रतिज्ञा, सच्चा वीर और उदार क्षत्रिय तथा कवि था ।

उसका आदर्श था कि बापा रावल का वंशज किसी के आगे सिर नहीं झुकायेगा । स्वदेश-प्रेम, स्वतन्त्रता और स्वदेशाभिमान उसके मूल-मन्त्र थे। इन्हीं गुणों के कारण वह अकबर को जो उस समय संसार का सबसे अधिक शक्तिशाली तथा ऐश्वर्य-सम्पन्न सम्राट था, अपने छोटे-से राज्य के बल पर वर्षों तक हैरान करता रहा और फिर भी अधीन न हुआ। वह केवल वीर और रण-कुशल ही नहीं, किन्तु धर्म को समझने वाला सच्चा क्षत्रिय था।

केवल शिकार के लिए कुछ सिपाहियों के साथ आते हुए मानसिंह पर धोखा व छल से हमला न कर और अमरसिंह द्वारा पकड़ी गयी बेगमों को सम्मानपूर्वक लौटाकर उसने अपनी विशाल हृदयता का परिचय दिया। “प्रलोभन देकर राजपूत राजाओं और सरदारों को सेवक बनाने वाली अकबर की कूटनीति का यदि कोई उत्तर देने वाला था तो वह महाराणा प्रताप ही था।”

आज भी प्रताप के वीर कार्यों की कथाएँ और गीत प्रत्येक राजपूत के हृदय में उत्तेजना पैदा करते हैं। महाराणा का नाम न केवल राजपूताने में अपितु सम्पूर्ण भारतवर्ष में अत्यन्त आदर और श्रद्धा से लिया जाता है। जब तक महाराणा का उज्ज्वल और अमर नाम लोगों को सुनाई पड़ता रहेगा तब तक वह स्वतन्त्रता और देशाभिमान का पाठ पढ़ाता रहेगा।”

श्री सतीश चन्द्र मित्रा प्रताप के व्यक्तित्व में एक देशभक्ति का आदर्श, साहस और शौर्य का प्रतीक देखते हैं। उनके मूल्यांकन में वह भारतीय गगन का एक देदीप्यमान नक्षत्र था जिसके चरित्र में बहादुरी से भी उदारता विशेष महत्त्वपूर्ण थी। देशभक्ति उसके चरित्र की धुरी थी। वह स्वर्ग से भी स्वदेश को अधिक महत्त्व देता था। उनके विचारों से “प्रताप जैसे महान व्यक्ति से भारत ही क्या कोई भी देश स्वाभिमान का अनुभव कर सकता है।

श्रीराम शर्मा भी प्रताप में एक महान् सेनानायक, साहसी सैनिक, सफल व्यवस्थापक; नरों में उत्तम और उदार शत्रु के गुण पाते हैं और कहते हैं कि जहाँ कहीं इन गुणों का सम्मान होगा, प्रताप का नाम श्रद्धा की दृष्टि से देखा जायेगा ।

पुस्तक मेवाड़ एण्ड दि मुगल एम्परर्स में लिखा है कि प्रताप ने लगभग 25 वर्ष तक भारतीय राजनीतिक मंच पर एक महत्त्वपूर्ण भाग लिया और अपनी अधिकांश प्रजा के मत का नेतृत्व किया।

उसने अपने शौर्य, उदारता और अच्छे गुणों से जन-समुदाय का सौहार्द्र और श्रद्धा अर्जित कर ली थी। उसने अपनी कर्त्तव्य-परायणता से तथा सफलता से अपने सैनिकों को कर्त्तव्यारूढ़, प्रजा को आशावादी और शत्रु को भयातुर बनाया।

एक सेनाध्यक्ष और जननेता के रूप में वह अपने जमाने के लिए उपयुक्त था। उसकी मृत्यु ने एक प्रकार से एक युग की समाप्ति कर दी थी। इन विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए प्रताप के सम्बन्ध में
हमारा ध्यान इस ओर भी जाता है कि जब अकबर सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में बाँधने जा रहा था

वहाँ प्रताप का उसके साथ न रहना कहाँ तक उपयुक्त था। जो सन्धि की शर्तें अकबर ने प्रताप के लिए रखीं थीं और जिन्हें कुछ वर्षों के बाद अमरसिंह को मानना पड़ा था, क्योंकि वे मेवाड़ के सम्मान के विपरीत न थीं, यदि इन्हें पहले ही मान लिया जाता तो मेवाड़ को धन , और जन की हानि न होती और सुख-समृद्धि के दिन मेवाड़ में पहले ही उदय हो सकते थे फिर भी यह मानना ही पड़ेगा कि प्रताप का नाम हमारे देश में स्वाभिमान और देश गौरव के रक्षक के रूप में अमर है ।

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